पता नही मैं इस जंगल में कब , क्यों और कैसे आ टपका। क्यों मैने मा सं वि (मानवीय संसाधन विकास), यानी कि, Human Resources Development पढने की बात सोच। जिस खेल के नियम कानून और कायदे सब मेरी समझ के बाहर थे , क्यों उसे खेलना शुरू किया... एक ऐसा खेल जिसे सीखने कि ना ही मेरी ख्वाइश थी और ना हीऔकात। यार, मेरी तो शुरुआत ही इन सब से बहुत दूर हुई थी।
बात सन् १९८२ की है । तब मैं पहली बार जमशेदपुर आया, बिहार के मैनेजमेंट इन्स्टिटुट ऑफ़ जमशेदपुर में भर्तीहोने। और तो और तब तो ह्यूमन रिसोर्स नाम की कोई चीज़ ही नही थी । उन दिनों ह्यूमन रेसौर्सेस को Industrial Relations यानी की औद्योगिक संबंध जैसे घटिया नाम से पुकारते थे। औद्योगिक संबंध !!! लगता है कोई यौनसंबंध की बात कर रहा है। कुछ लोग इसी कोर्स को सोशल वेलफेयर के नाम से पुकारते थे। नाम का सही होनाबहुत ज़रूरी है। आधा इम्प्रेशन खराब नाम से ही हो जाता है। नौकरी मिलती थी उन दिनों तो वेलफेयर अफसरकी। मुझे हमेशा लगता है की वेलफेयर अफसर से हम लोगों को समाज में इज़्ज़त दिलाना रास्कल रुस्टी जैसेकिसी दिमागी इन्सान का ही काम हो सकता है। उस बन्दे ने कहा होगा, "फार्मूला को ज़रा सा बदल दो, डिब्बा बदलदो और विज्ञापन में किसी छोटी सी बिकीनी पहनी हुई कुड़ी को दिखा दो। अरे मार्केटिंग देपर्त्मेंत के लोग हर सालसाबुन और टूथ पेस्ट के साथ यही तो करते हैं। तो हमारा पेर्सोंनेल मैनेजमेंट और औद्योगिक समबन्ध जैसे बाबाआदम के ज़माने का नाम भी बदल कर ह्यूमन रेसौर्सेस हो गया। और एम् आई जे से पढने वाले छात्र HR में माहिर कहलाने लगे।
दो साल तक एम् आई जे में घिसने के बाद एक दिन मुझे भी कॉरपोरेट सेक्टर में छोड़ दिया गया। वक़्त के साथ साथ मैं भी एक दिन देश के एक नामी कंपनी का HR हेड बन गया। मुझ पर एम् ई जे का ठप्पा जो लगा था। और अगर मैनेजमेंट की भाषा में बोलूँ तो यह कहिये की मेरे पास एम् ई जे का ब्रांड था।
gud ...Mr Bhaduri .. kakh ka chuan pauri ys tihri ?
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